त्रिम्बकेश्वर


त्रिम्बकेश्वर

त्रिम्बकेश्वर यह त्रिंबक शहर में एक प्राचीन हिंदू मंदिर है, यह भारत मे महाराष्ट्र राज्य के नासिक शहर से 2८ किमी दुर है| यह मंदीर भगवान शिव को समर्पित है और शिवजी के बारह ज्योर्तीलींग मे से एक है|


यह स्थल गोदावरी नदी के उगम स्थान से भी जाना जाता है जो प्रायद्वीपीय भारत में सबसे लंबी नदी है।

गोदावरी नदी को हिंदू धर्म मे पवित्र माना जाता है। जो ब्रम्हगीरी पहाड़ों से निकलके राजमहेंद्रु के पास समुद्र मिलती है। तिर्थराज कुशावर्त को नदी गोदावरी का प्रतीकात्मक मूल माना जाता है और एक पवित्र स्नान जगह के रूप में हिंदुओं द्वारा प्रतिष्ठित है।






त्र्यंबकेश्वर मंदिर

   ( मंदिर का समय 5.30 सु. - 9 . 00 सं )

trambakeshwar temple
र्यंबकेश्वर मंदिर हिंदू तीर्थयात्रियों और भगवान शिव के 12 ज्योर्तिलिंगों मे से एक है। त्र्यंबकेश्वर मंदिर ब्रम्हगिरि पहाड़ की तलहटी में निहित है| जो गंगा (यहाँ गोदावरी नाम से जाना जाता है|) नदी का द्वारा कहा जाता है | इस मंदिर का सबसे आकर्षक हिस्सा है 3 लिंग| प्रत्येक लिंग ब्रह्मा, विष्णु और शिव का प्रतिनिधित्व करता है| सभी तीन देव शिव लिंगम के भीतर उपस्थिति है।

यह मंदिर श्री नाना साहेब पेशवा द्वारा 1755-1786 ईस्वी में बनाया गया है। यह मंदिर काले पत्थरोंसे बनाया गया है| कहा जाता है कि यह शिवलिंग स्वाभाविक रूप से उभरा है। मंदिर के चारों ओरसे मंदिर में चारों ओर का तट 20-25 फीट पत्थर कि ऊंचीं दीवार है। मंदिर बस स्टैंड से सिर्फ 10 मिनट के अंतर पर है| इसीलिये मंदिर तकपोहोंचने के लिए किसी वाहन कि जरूरत नहीं पैदल चलकर भी जा सकते है| प्रवेश द्वार पर हमे कतार में जाना होता है| ये पंक्तियाँ 6-7 लाइनोमे कटी है| मुख्य मंदिर के लिए जो कतार है, वो नंदी मंदिर से होकर जाती है जो शिव मंदिरके सामने बांधा गया है | जैसा कि हम जानते है कि शिव मंदिर में नंदी कि मूर्ति हमेशा शिवलिंगके सामने होती है| नंदी की मूर्ति बाहर एक पैर के ऊंचाई पर सफेद संगमरमर के नक्शिदार मंच पर बैठी है| इस नंदी मंदिर को पार करके हम शिव मंदिर में कदम रखतें है| फिर हम एक बड़े हॉल में आते है जिसकी छत अंदर से गुंबद के आकार का है| गर्भगृह बड़ा नहीं है और शिवलिंग और तीन लिंग खांचमे स्थित है|

मंदिर के बाहर प्रवेश द्वार के सामने, कुछ गायों को घास खाते देखा जा सकता है|
 

कुशावर्त:

मुख्य मंदिर से 5 मिनट के दुरीपर एक पवित्र तालाब 'कुशावर्त' है |कुशावर्तमे से गोदावरी नदी प्रवाह प्राप्त करती है| एसा माना जाता है के अगर कुशावर्त मे स्नान करे तो मानव के सभी पाप धुल जाते है|

गौतम ऋषि के हातो जब गोहत्या हुई थी तब उन्होने कुशावर्त मे स्नान किया और उनका पाप धुल गया एसी कथा बताई जाती है| सभी धार्मिक विधि यही पे होते है|








ब्रम्हगीरी :

इस जगह पर गंगा नदी का उगमस्थान है| यहा पे गंगा और शंकर भगवान का मंदिर है| थोडीही दूरी पे शिवजटा मंदिर भी है|

ब्रम्हगिरी पर्वत पे जाने के लिए ५०० सीडिया है| यहा से गोदावरी नदी ३ दिशाओ मे बहती है| पूर्व दिशा मे बहने वाली नदी को गोदावरी कहते है, दक्षिण मुखी नदी को वैतरणा कहते है और पश्चिम मुखी नदी को पश्चिम गंगा कहते है| यह पर्वत १८०० फिट उँचा है और इसकी समुद्र टल से उँचाई ४२४८ फिट है|यहा पे सद्यो,जदा,वामदेव,अघोरा,ईशाना और ततपुरुषा एसे पाँच सुले है|इन्हे शिवके पाँच मुख भी कहते है|



गंगाद्वार :

ब्रम्हगिरी पर्वत के रास्ते मे गंगाद्वार है जिसे अब गोदावरी नदी कहते है| यही पे गोदावरी नदी का उगम हुआ था| यहा पास मे ही गोरक्षणाथ गुंफा, १०८ शिवलिंग और राम-लक्ष्मण तीर्थ है| गंगाद्वार जाने के लिए ७०० सीडिया है| यहा पे गंगा की मूर्ति है, जिसके पैर के पास गाय के सिर के आकार का पत्थर है जिसके मुख से पानी टपकता है|

नील पर्वत :

यहा पे निलंबिका देवि का मंदिर है|यहा जाने के लिए २०० सीडिया है| श्रीमंत सेठ कपोल ने ये सीडिया बँधवाई है| यहा पे नील कान्तेश्वर महादेव का मंदिर है और परशुरामकी मूर्ति भी है| ये जगह गाव की उत्तर दिशा मे है|







गौतम तीर्थ :

गौतम तीर्थ गंगा नदीके दक्षिण दिशा मे है| वरुण राजाने खुश होके गौतम ऋषि को ये तीर्थ दिया था| गौतम तीर्थ गौतमेश्वर के उत्तर दिशा मे और रामेश्वर के दक्षिण दिशा मे है| ये तीर्थ ६००/४०० फीट लम्बा है| ये तीर्थ श्रीमंत पंडित झाशिवाले ने बांधा है|


बिल्व् तीर्थ:

ये तीर्थ नील पर्वत् के उत्तर दिशा मे है| यहा पे बिल्वकेश्वर महादेव का मंदिर है| ये तीर्थ नारो विनायक गोगटे ने १७३८ मे बाँधा है |


इंद्र तीर्थ :

ये तीर्थ कुशावर्त के पूर्व दिशा मे है| यहिपे गौतम ऋषि ने इंद्र देव को शाप दिया था| यहापे इंद्रेशवर महादेव का सुंदर मंदिर है| ये तीर्थ विष्णु महादेव गद्रे ने १७७८ मे बाँधा था|


अहिल्या संगम तीर्थ :

एक बार गौतम ऋषि की तपस्या भंग करने के लिए गंगा की सहेली जटिला ने उनकी पत्नी अहिल्या का रूप लिया| ये बात गौतम ऋषि को सॅमज़ने के बाद उन्होने जटिला को शाप दिया और उसे नदी मे परावर्तित किया | लेकिन उसके क्षमायाचना करने के बाद उन्होने उसे उषाप दिया की जिस वक्त उसका गोदावरी नदी के साथ संगम होगा उस वक्त वो शाप मुक्त होगी| इसी तीर्थ पर उसका गोदावरी नदी से मिलन हुआ था इसलिए इस तीर्थ को अहिल्या संगम तीर्थ कहते है|


श्री निवृत्तिनाथ मंदिर :

निवृत्तिनाथ मंदिर गंगाद्वारके पास है| इस जगह पर निवृत्तिनाथ महाराज की समाधि है| यह जगह गाव के पश्चिम दिशा मे है| संत निवृत्तिनाथ महाराज ने यहिपे अपने गुरु गहिनिनाथ से दीक्षा प्राप्त की थी|




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