कालसर्प शांती पूजा


कालसर्प शांती पूजा

जन्म कुंडली में जब सभी ग्रह राहु और केतु के एक ही और स्िथत हों तो ऐसी ग्रह स्थिती को कालसर्प योगकहते है। कालसर्प योग एक कष्ट कारक योग है।

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राहु के गुण -अवगुण शनि जैसे हैं ।राहु जिस स्थान में जिस ग्रह के योग में होगा, उसका व शनि का फल देता है। शनि आध्यात्मिक चिंतन, विचार, गणित के साथ आगे बढने के गुण अपने पास रखता है। यही बात राहु की है।

राहु का योग जिस ग्रह के साथ है वह किस स्थान का स्वामी है यह भी अवश्य देखना चाहिए। राहु मिथुन राशि मेंउच्च, धनु राशि में नींच और कन्या राशि में स्वागृही होता है राहू के मित्र ग्रह-शनि, बुध और शुक्र है। रवि-शनि, राहुइसके शत्रु ग्रह है। चन्द्र, बुध, गुरु उसके समग्रह है । कालसर्प योग जिस व्यक्ती के जन्मांग में है, ऐसे व्याक्ति को अपनेजीवन में बहुत कष्ट झेलना पडता है । इच्छित फल प्राप्ति और कार्यो में बाधाएं आती है। बहुत ही मानसिक, शारीरीकएवं आर्थिक रुप से परेशान रहता है।

कालसर्प योग से पिडीत जातक का भाग्य प्रवाह राहु केतु अवरुध्द करते है। जिसके परिणामस्वरुप जातक कीप्रगति नही होती। उसे जीवीका चलाने का साधन नहीं मिलता अगर मिलता है तो उसमें अनेक समस्यायें पैदा होती है।जिससे उसको जिविका चलानी मुश्किल हो जाती है। विवाह नही हो पाता। विवाह हो भी जाए तो संतान-सुख में बाधाएंआती है।










कालसर्प के प्रकार


  • अनंत कालसर्प योग :

    जब लग्न में राहु और सप्तम भाव में केतु हो और उनके बीच समस्त अन्य ग्रह इनके मध्या मे हो तो अनंत कालसर्प योग बनता है । इस अनंत कालसर्प योग के कारण जातक को जीवन भर मानसिक शांति नहीं मिलती । वह सदैव अशान्त क्षुब्ध परेशान तथा अस्िथर रहता है: बुध्दिहीन हो जता है। मास्ितक संबंधी रोग भी परेशानी पैदा करते है।






  • कुलिक कालसर्प योग :

    जब जन्मकुंडली के व्दितीय भाव में राहु और अष्टम भाव में केतू हो तथा समस्त उनके बीच हों, तो यह योग कुलिक कालसर्प योंग कहलाता है।



  • वासुकि कालसर्प योग :

    जब जन्मकुंडली के तीसरे भाव में राहु और नवम भाव में केतु हो और उनके बीच सारे ग्रह हों तो यह योग वासुकि कालसर्प योग कहलाता है।



  • शंखपाल कालसर्प योग :

    जब जन्मकुंडली के चौथे भाव में राहु और दसवे भाव में केतु हो और उनके बीच सारे ग्रह हों तो यह योग शंखपाल कालसर्प योग कहलाता है।



  • पद्म कालसर्प योग

    जब जन्मकुंडली के पांचवें भाव में राहु और ग्याहरहवें भाव में केतु हो और समस्त ग्रह इनके बीच हों तो यह योग पद्म कालसर्प योग कहलाता है।



  • महापद्म कालसर्प योग

    जब जन्मकुंडली के छठे भाव में राहु और बारहवें भाव में केतु हो और समस्त ग्रह इनके बीच कैद हों तो यह योग महापद्म कालसर्प योग कहलाता है।



  • तक्षक कालसर्प योग

    जब जन्मकुंडली के सातवें भाव में राहु और केतु लग्न में हो तथा बाकी के सारे इनकी कैद मे हों तो इनसे बनने वाले योग को तक्षक कालसर्प योग कहते है।



  • कर्कोटक कालसर्प योग

    जब जन्मकुंडली के अष्टम भाव में राहु और दुसरे भाव में केतु हो और सारे ग्रह इनके मध्य मे अटके हों तो इनसे बनने वाले योग को कर्कोटक कालसर्प योग कहते है।



  • शंखनाद कालसर्प योग

    जब जन्मकुंडली के नवम भाव में राहु और तीसरे भाव में केतु हो और सारे ग्रह इनके मध्य अटके हों तो इनसे बनने वाले योग को शंखनाद कालसर्प योग कहते है।


  • पातक कालसर्प योग

    जब जन्मकुंडली के दसवें भाव में राहु और चौथे भाव में केतु हो और सभी सातों ग्रह इनके मध्य मे अटके हों तो यह पातक कालसर्प योग कहलाता है।



  • विशाधर कालसर्प योग

    जब जन्मकुंडली के ग्याहरहवें भाव में राहु और पांचवें भाव में केतु हो और सारे ग्रह इनके मध्य मे अटके हों तो इनसे बनने वाले योग को विषाक्तर कालसर्प योग कहते है।



  • शेषनाग कालसर्प योग

    जब जन्मकुंडली के बारहवें भाव में राहु और छठे भाव में केतु हो और सारे ग्रह इनके मध्य मे अटके हों तो इनसे बनने वाले योग को शेषनाग कालसर्प योग कहते है।




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